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क्यों यूरोप में सेंटर-राइट और फार-राइट पास आते दिख रहे हैं?

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क्यों यूरोप में सेंटर-राइट और फार-राइट पास आते दिख रहे हैं?
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यूरोपीय संसद में सेंटर-राइट पार्टी अब धुर-दक्षिणपंथी पार्टी के साथ हाथ मिला रही है. इससे यूरोपीय संघ की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

इसके कई संकेत मिल रहे हैं कि यूरोपीय संसद काम करने का एक नया तरीका अपना रही है: जब संभव हो, तो यूरोप-समर्थक उदारवादियों के साथ काम करना और जब जरूरत हो तो धुर दक्षिणपंथियों का सहारा लेनाजर्मन राजनीति का नियम बहुत सीधा है: धुर दक्षिणपंथियों के साथ कोई सहयोग नहीं.

वहां की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ‘एएफडी' के खिलाफ एक ‘लोकतांत्रिक लक्ष्मण रेखा' खींची गई है. लेकिन ब्रसेल्स और स्ट्रासबर्ग में अब बेचैन करने वाला सवाल उठ रहा है: क्या यूरोप की सेंटर-राइट पार्टी अभी भीअलग-थलग रखने में विश्वास करती है या वह अपनी सुविधानुसार बहुमत पाने और कानून पारित कराने के लिए उन पर निर्भर होने लगी है? यह सवाल अब और भी जोर पकड़ने लगा है. ऐसी खबरें आई हैं कि यूरोपीय सेंटर-राइट की सबसे बड़ी ताकत, यूरोपियन पीपल्स पार्टी के सांसदों ने प्रवासन नीति से जुड़े महत्वपूर्ण वोटों से पहले धुर दक्षिणपंथी समूहों के साथ तालमेल बिठाया था. इसमें ‘रिटर्न हब' जैसे विवादास्पद प्रस्ताव भी शामिल हैं, जिसके तहत यूरोपीय संघ की सीमाओं के बाहर निर्वासन केंद्र बनाने की योजना है. इन खबरों की अहमियत सिर्फ यह नहीं है कि धुर दक्षिणपंथियों ने सेंटर-राइट के साथ मिलकर वोट दिया, बल्कि यह भी हो सकता है कि उनके बीच पहले से संपर्क हो, शब्दों के चयन पर आपसी सहमति बनी हो और साझा बहुमत बनाने की कोशिश की गई हो. असली कहानी सिर्फ एक विवादित वोट तक सीमित नहीं है. यह इस बात पर टिकी है कि क्या ईपीपी काम करने का एक नया तरीका अपना रही है: जब संभव हो, तो यूरोप-समर्थक उदारवादियों के साथ काम करना और जब जरूरत हो तो धुर दक्षिणपंथियों का सहारा लेना.जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स में ईयू संस्थानों के विशेषज्ञ निकोलाई फॉन ओन्दार्जा का तर्क है कि यह सिर्फ इकलौता मामला नहीं है. यह संसद के काम करने के तरीके में ढांचागत बदलाव का संकेत है.उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा,"ईयू यूरोपीय संसद में एक तरह की अल्पमत सरकार की दिशा में आगे बढ़ रहा है.” उनके मुताबिक, ईपीपी अब दो संभावित बहुमतों के बीच चुनाव कर रही है: पहला, समाजवादियों और उदारवादियों के साथ पुराना और पारंपरिक यूरोप-समर्थक गठबंधन. दूसरा, जो अब बढ़ता जा रहा है - अपने से ज्यादा दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ मिलकर बहुमत बनाना.इसका मतलब यह नहीं है कि संसद का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है. ओन्दार्जा इस बात पर जोर देते हैं कि अभी भी 80 फीसदी से ज्यादा फैसले मुख्यधारा के ‘यूरोप-समर्थक' बहुमत द्वारा ही लिए जाते हैं. लेकिन वे कहते हैं कि मुख्य बदलाव यह है कि अब दक्षिणपंथी विकल्प ‘अछूता' नहीं रहा. यह अभी भी अपवाद है, लेकिन एक ऐसा अपवाद जो अब ज्यादा बार देखने को मिल रहा है. ब्रसेल्स स्थित थिंक टैंक ‘सीईपीएस' की रिसर्च फेलो सोफिया रुसैक कहती हैं कि ये ताजा रिपोर्टें उस बात की पुष्टि करती हैं जिसका संसद में कई लोगों को पहले से ही शक था. उन्होंने डीडब्ल्यू को दिए एक इंटरव्यू में कहा,"यही अब नई सामान्य बात लगने लगी है.”रुसैक ने जर्मनी और बाकी यूरोप की मीडिया की प्रतिक्रियाओं के बीच एक बड़े अंतर की ओर इशारा किया है. उनके अनुसार, जर्मनी में मचा हंगामा यह बताता है कि वहां अभी भी धुर-दक्षिणपंथियों के खिलाफ ‘फायरवॉल' की राजनीतिक अहमियत है. इसके विपरीत, बाकी यूरोप में माहौल ऐसा है जहां धुर दक्षिणपंथियों के साथ सहयोग करना अब उतनी चौंकाने वाली बात नहीं रही.दोनों विश्लेषकों के मुताबिक, ‘अचानक हुए तालमेल' और ‘सक्रिय सहयोग' के बीच एक बड़ा अंतर है. ईपीपी लंबे समय से अपना बचाव यह कहकर करती रही है कि वहउसी तरह वोट देने से नहीं रोक सकती जिस तरह वह खुद देती है. हालांकि, ओन्दार्जा का कहना है कि अब ऐसे पुख्ता सबूत मिल रहे हैं कि पर्दे के पीछे कुछ बहुत ही सोच-समझकर किया जा रहा है. इसमें बिल की भाषा पर आपसी सहमति और मिलकर बहुमत जुटाने की कोशिशें शामिल हैं. रुसैक इस मिलीभगत पर जोर देती हैं. उन्होंने कहा,"आप उन्हें अपनी तरह वोट करने से नहीं रोक सकते. लेकिन हां, आप संशोधनों को इस तरह से लिख सकते हैं कि वे आपका समर्थन करें.”यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे इस गठबंधन का राजनीतिक मतलब पूरी तरह बदल जाता है. यूरोपीय संसद में कई देशों की संसद की तरह ‘सरकार बनाम विपक्ष' जैसा सीधा बंटवारा नहीं होता. यहां अक्सर हर मुद्दे के लिए अलग-अलग बहुमत जुटाया जाता है. लेकिन, अगर कानून का मसौदा धुर-दक्षिणपंथियों के समर्थन को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है या अगर संसदीय सदस्य पहले से ही उन पार्टियों के साथ बातचीत करते हैं, तो यह रिश्ता अब केवल एक इत्तेफाक नहीं रह जाता, बल्कि यह सोची-समझी रणनीति बन जाती है.यह रणनीति थोड़े समय के लिए ईपीपी को मजबूत कर सकती है, क्योंकि अब उसके पास अपनी पसंद के अनुसार लेफ्ट या राइट, किसी भी तरफ से साथी चुनने की आजादी है. ओन्दार्जा का कहना है कि 2024 के यूरोपीय चुनावों ने संसदीय समीकरण को साफ तौर पर बदल दिया है और सेंटर-राइट को दांव-पेच खेलने के लिए ज्यादा गुंजाइश दी है, लेकिन वे यह चेतावनी भी देते हैं कि इस ताकत की एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है.एक जोखिम व्यावहारिक है: ईपीपी जितनी बार दक्षिणपंथियों की ओर मुड़ेगी, समाजवादी और उदारवादी दल उन कई अन्य मुद्दों पर सहयोग करने के लिए उतने ही कम तैयार होंगे जहां ईपीपी को अभी भी उनकी जरूरत है. इसका परिणाम यह हो सकता है कि यूरोपीय संघ पहले से कहीं ज्यादा अस्थिर और अनिश्चित बन जाए.दूसरा जोखिम राजनीतिक है: यदि सेंटर-राइट पार्टियां लगातार धुर दक्षिणपंथियों को एक साझेदार के रूप में मान्यता देती हैं, तो वे अंततः उन ताकतों को सशक्त बना सकती हैं जो सिर्फ नीतियों को प्रभावित नहीं करना चाहतीं, बल्कि यूरोपीय संघ के पूरे राजनीतिक स्वरूप को ही बदलना चाहती हैं. असली खतरा यह है कि उदारवाद-विरोधी और विविधता-विरोधी ताकतों को यूरोप की परिभाषा बदलने के लिए और भी ज्यादा शक्ति मिल जाएगी. उन्होंने एक ऐसी चेतावनी दी है जिसे कई सदस्य देश पहले ही दोहरा चुके हैं: मुख्यधारा के रूढ़िवादियों को लग सकता है कि वे धुर-दक्षिणपंथियों का समर्थन लेकर उन्हें काबू कर रहे हैं, लेकिन इसके बजाय वे एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी को मजबूत कर रहे हैं जो किसी दिन उनसे आगे निकल सकता है. साफ शब्दों में कहें, तो ‘रूढ़िवादी खुद को हाशिए पर धकेलने का जोखिम उठा रहे हैं.'रुसैक ने संसद के भीतर की कार्यप्रणाली के आधार पर भी एक वैसी ही बात कही है. धुर दक्षिणपंथियों के पास ब्रसेल्स और स्ट्रासबर्ग में लंबे समय से सीटें, बोलने का समय और प्रचार के साधन मौजूद रहे हैं. लेकिन वह तर्क देती हैं कि अब जो बदलाव आ रहा है, वह यह है कि ये दल अब फैसलों के नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम हो रहे हैं. इससे उनकी राजनीतिक साख बढ़ रही है. वह कहती हैं,"संसद में चुनकर आना एक बात है, लेकिन फैसलों को तय करना बिल्कुल दूसरी बात है.” रुसैक प्रवासन का उदाहरण देती हैं, जहां ऐसे विचार और शर्तें जिन्हें कभी राजनीतिक रूप से ‘अकल्पनीय' माना जाता था, लेकिन इन्हें अब सेंटर-राइट ने अपना लिया है. हालांकि, यह मुद्दा सिर्फ प्रवासन तक सीमित नहीं है. दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि एक बार जब धुर दक्षिणपंथी पार्टी, सेंटर-राइट के लिए लंबे समय तक समर्थन का जरिया बन जाती है, तो उसकी पकड़ मजबूत हो जाती है. ऐसा होने पर वह यूरोप की नीतियों की भाषा, प्राथमिकताओं और सीमाओं को प्रभावित करने लगती है.

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